एक संभावना…अनुभव की

रात गहरा चुकी है। खिड़की से झाँकता वो हँसली सा चाँद टहनियों पर झूले झूल रहा है। पेड़ पर बैठा एक पक्षी आधी रात में अपनी किसी पूर्व प्रेमिका के लिए कोई विरह का लोकगीत लिख रहा है। वादे अनुसार किताब पढ़ ली गई है। लेकिन नींद अब भी कोसों दूर है। और दूसरी किताब उठाने का अर्थ है सुबह के सूरज को निमंत्रण देना।

आज के दिन की बात करें तो ठीक वैसा ही रहा, जैसा कल का था। दिन अपने आप को दोहरा रहें हैं। सुबह भजन के साथ दंत मंजन किया, माताजी की डाँट के साथ काढ़ा पिया और पिताजी के किस्से पर ठहाके लगाए गए। वही किस्से जिन्हें माँ तरकारी काटते हुए रोज सुनती है। माँ ने सारे किस्से सुन रखे हैं। पर फिर भी बड़ी तन्मयता से पुनः सुनती है। क्यूँ सुनती है मुझे नहीं पता। मैं तो नहीं सुन पाती । लेकिन माँ कहती है कि तेरे पिता उन किस्सों में बहुत खुश होते हैं। तो

मैं टोकती नहीं

और ऐसा है भी। कोई इंसान जब अपना खुशनुमा बीता कल बता रहा होता है तो उम्र उसके चेहरे से कुछ कुछ छंटने लगती है। जैसे पिता जब अपनी शादी के किस्से बताते हैं तो बीस साल के लड़के लगते हैं। पिता को बीस साल का देखना, संतान के लिए एक मुलायम अनुभूति है।

खिड़की के बाहर वो चाँद अब रूठ कर पेड़ से कुछ दूर जा बैठा है। ठंडी हवा पेड़ों को सहला सहला सुलाने की तैयारी में है। प्रकृति अपने स्वरूप में किसी नवविवाहित स्त्री का श्रृंगार है।

उसने कभी हमसे मुँह नहीं मोड़ा। वो तो हम थे जिन्होंने दीवारे बना ली। पेड़ की छाँव तो अभी भी वैसी की वैसी है। पेड़ ने कभी दीवार नहीं बनाई । नदी ने कहा सब जल तुम्हारा है, नदी ने कोई बर्तन नहीं बनाया। बर्तन बाँध हमने बनाए घर दीवार हमने बनाई कुदरत तो अब भी हमीं से प्रेम करती है। इस भद्दी महमारी में भी ऑक्सीजन ही हमारी मदद कर रहा है। हमारी बनाई दीवारें मीनारें सब निरर्थक हो गई । संसाधनों ने अपना अर्थ खो दिया और हमने अपना अस्तित्व हमें कुदरत की ओर लौटना होगा। वो पक्षी आधी रात में किसी प्रेमिका के लिए नहीं, हमारे लिए विरह के लोकगीत लिख रहा है।

स्नेही।।

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